Jammu Kashmir government released National Conference leader Omar Abdullah from detention Farooq Abdullah Article 370 Public Safety Act - संपादकीय: रिहाई और उम्मीद - Jansatta

संपादकीय: रिहाई और उम्मीद

दरअसल, घाटी में सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद को रोकना है। कुछ अलगाववादी और कट्टरपंथी ताकतों का समर्थन पाकर चरमपंथी संगठन वहां अपनी जड़ें जमाए हुए थे। उनके उकसावे या फिर दबाव में आकर स्थानीय लोग भी प्रशासन का अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहे थे। बहुत सारे युवा गुमराह होकर आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गए थे।

Author Published on: March 26, 2020 1:42 AM
पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को लगभग आठ महीने बाद मंगलवार (24 मार्च, 2020) को हिरासत से रिहा कर दिया गया। (PTI)

करीब आठ महीने हिरासत में रहने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को रिहा कर दिया गया। इससे दूसरे नेताओं की रिहाई को लेकर उम्मीद बनी है। इससे पहले फारूक अब्दुल्ला को रिहा कर दिया गया था। स्वाभाविक ही अब पीडीपी नेता और पूर्वमुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को रिहा करने की मांग होने लगी है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद इन नेताओं को नजरबंद कर दिया गया था। पर बाद में इन्हें जनसुरक्षा कानून यानी पीएसए के तहत हिरासत में लेकर उनके आवास से दूर बंद कर दिया गया था। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटाने का जम्मू-कश्मीर में काफी तीखा विरोध हो रहा था।

उसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी के नेता भी शामिल थे। इस तरह इन दलों के नेताओं को राजनीतिक गतिविधियों में शामिल रहने की छूट देने से घाटी में बदअमनी का अंदेशा था। इसलिए उनमें से बड़े नेताओं को नजरबंद कर दिया गया औेर बहुत सारे नेताओं को अपने घरों से बाहर निकलने, रैलियों, बैठकों आदि में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था। इससे आम लोगों को उकसाने, भड़काने और उग्र प्रदर्शन आदि पर काबू पाया जा सका। उम्मीद की जा रही थी कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के दो-तीन महीने बाद स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाल हो सकेगी, मगर अब भी वहां स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है, जिसके चलते सुरक्षा कारणों से सरकार को पाबंदियां बढ़ानी पड़ती रही हैं।

दरअसल, घाटी में सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद को रोकना है। कुछ अलगाववादी और कट्टरपंथी ताकतों का समर्थन पाकर चरमपंथी संगठन वहां अपनी जड़ें जमाए हुए थे। उनके उकसावे या फिर दबाव में आकर स्थानीय लोग भी प्रशासन का अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहे थे। बहुत सारे युवा गुमराह होकर आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गए थे। वे सब लंबे समय से कश्मीर की आजादी की मांग कर रहे थे। ऐसे में सरकार की तरफ से किसी भी तरह की ढिलाई विस्फोटक साबित हो सकती थी।

इसीलिए वहां सुरक्षाबलों की संख्या बढ़ा दी गई और संचार सुविधाओं को रोक कर अशांति फैलने से रोकने का प्रयास किया गया। अब स्थिति काफी हद तक नियंत्रण में है और लोगों का गुस्सा थिर होता दिखने लगा है। वे अब सामान्य जीवन जीने की राह पर लौटना चाहते हैं। ऐसे में धीरे-धीरे राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ बरती जा रही सख्ती और लोगों की संचार जैसी सुविधाओं पर पाबंदी में ढील दी जाने लगी है। यह घाटी में स्थिति सुधरने और लोकतंत्र बहाली की दिशा में उम्मीद भरा संकेत है।

कश्मीर में सबसे बड़ी चुनौती वहां के लोगों में यह विश्वास पैदा करना है कि वे इसी देश के नागरिक हैं और उनके हितों की रक्षा सरकार की प्राथमिकता है। अभी तक वे आजादी की भ्रामक मांग के वशीभूत सरकार के प्रति विरोध का भाव अख्तियार किए हुए थे। उनमें जिस दिन यह विश्वास पैदा हो जाएगा कि जम्मू-कश्मीर का मुस्कबिल भारत के भीतर रह कर ही सुरक्षित है, उस दिन से वहां आतंकवाद और पाकिस्तान की बेजा दखल का खात्मा होना शुरू हो जाएगा। घाटी के नेता रिहाई से बाहर निकल कर लोगों में यह विश्वास रोपने में मदद करेंगे, यह भी उम्मीद स्वाभाविक है। जब तक वे ऐसा नहीं करेंगे, तब तक घाटी में जन जीवन सामान्य और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सुचारु होने की उम्मीद धुंधली ही बनी रहेगी।

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